चित्रगुप्त पूजा 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि.
चित्रगुप्त पूजा 2025: तिथि, महत्व और पूजा विधि
तिथि और शुभ मुहूर्त
- 2025 में यह त्योहार 23 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। यह कार्तिक शुक्ल द्वितीया (भैया दूज) के दिन आएगा। पूजा का शुभ समय दोपहर 1:13 बजे से 3:28 बजे तक है, जो करीब 2 घंटे 15 मिनट का है।
- चित्रगुप्त पूजा का महत्व
- चित्रगुप्त जी को हिंदू धर्म में कर्मों का लेखकों और न्याय करने वाले देवता माना जाता है। खास तौर पर कायस्थ समाज के कुलदेवता होते हैं।
- कहते हैं कि मृत्यु के बाद हमारे कर्मों का लेखा-जोखा चित्रगुप्त जी की कर्म-पुस्तिका में ही दर्ज होता है।
- इस दिन हम अपने जीवन, नैतिकता और कर्म की समीक्षा कर संकल्प लेते हैं।
- पूजा-विधि (Step-wise)
- सवेरे नित्य स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें। पूजा स्थल को स्वच्छ करें और चित्रगुप्त जी की मूर्ति या तस्वीर दिशा पूर्व की ओर सेट करें।
- पूजा की जगह पर कलम, कागज और दीवट रखें, क्योंकि ये चित्रगुप्त जी के साथ इस दिन विशेष रूप से संबधित होते हैं।
- मूर्ति या तस्वीर के सामने दीपक या सूरज की रोशनी जलाएं। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें: दूध, दही, घी, शहद और चीनी।
- तुलसी और कलश का स्थापन करें, फिर हल्दी, चंदन, फूल, फल, मिठाई, अक्षत और रोली अर्पित कर शुभकामनाएँ दें।
- मंत्र पढ़ें: “मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेत्तं च महाबलम्। लेखिनीपट्टिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाम्यहम्।।”, और कथा, पूजा और आरती करें।
- परिवार के सदस्यों के कल्याण और सुख की कामना करें।
- सांस्कृतिक पक्ष और कथा
- कहानी है कि ब्रह्मा जी ने अपने शरीर के मध्यभाग से चित्रगुप्त का जन्म किया। इन्हें जीवात्मा के कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाला माना जाता है।
- कायस्थ समाज इस दिन अपने पुराने खातों, बही-खाते और लेखन सामग्री की पूजा करता है और नए कार्यों की शुरुआत करता है।
भाई दूज 2025: प्रेम, बंधन एवं संस्कार
तिथि और मुहूर्त
- यह त्योहार 23 अक्टूबर, गुरुवार को मनाया जाएगा। तिलक का शुभ समय दोपहर 1:13 से 3:28 बजे तक है। यह पर्व 22 अक्टूबर रात 8:16 से लेकर 23 अक्टूबर रात 10:46 बजे तक चलता है।
- भाई दूज का महत्व
- यह भाई-बहन के प्यार, भरोसे और रक्षा के संस्कार का जश्न है। बहनों को भाइयों की दीर्घायु और खुशहाली की प्रार्थना करनी होती है, और भाई वचन देते हैं कि वे हमेशा रक्षा करेंगे।
- पौराणिक कथाओं के अनुसार, यमराज अपनी बहन यमुनाजी से मिलने इस दिन आए थे। बहन ने तिलक लगाकर और भोजन कराकर यमराज से वरदान मांगा कि इस दिन पूजा करने वाले भाइयों को कोई कष्ट नहीं होगा।
- पूजा-विधि (Step-wise)
- बहन अपने भाई को घर बुलाती है या फिर वगो जाती है। पहले भाई का हाथ धोती है और पूरे कानकांटा का तिलक लगाती है।
- माथे पर रंगोली या गोबर का चौक बनाकर, अक्षत और रोली से तिलक करती है।
- भाई को मिठाई और फल खिलाती है, साथ ही उपहार भी देती है।
- भाई अपनी बहन को आशीर्वाद और उपहार देता है।
- यम और यमुना की कथा सुनकर श्रवण करें।
- सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
- यह त्योहार दीपावली के पांच दिनों में अंतिम दिन होता है।
- मौजूदा समाज में भी यह पर्व भाई-बहनों के बीच प्यार और प्रेम को नई ऊर्जा देता है।
- यह पूजा 22 अक्टूबर 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। यह दिवाली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को होती है।
- सुबह का शुभ मुहूर्त 6:26 से 8:42 बजे तक है और सायंकालीन मुहूर्त 3:29 से 5:44 बजे तक रहता है।
- महत्व एवं कथा
- यह त्योहार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की याद में मनाया जाता है। भगवान ने ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाया था।
- साथ ही, ‘अन्नकूट’ का आयोजन भी होता है, जिसमें 56 से 108 व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
- पूजा-विधि (Step-wise)
- ब्रज में गोबर और मिट्टी से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाएं और चारों ओर गाय, बछड़े, ग्वाले आदि की मूर्तियां सजाएं।
- अन्नकूट में बने विभिन्न पकवान और मिठाइयां भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित करें।
- गोवर्धन परिक्रमा करें, दीप जलाएं, कथा सुनें, भजन और आरती करें।
- इसके साथ ही, गोवर्धन की पूजा में गाय और धन की भी पूजा की जाती है, जो कृषक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- सामाजिक संदेश
- यह पर्व प्रकृति, पशुधन और खेती के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है।
- जीवन, पर्यावरण और संसाधनों के संरक्षण का संदेश भी इसमें निहित है।
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट 2025: तिथि, महत्व और अनुष्ठान
तिथि और मुहूर्त
निष्कर्ष
चित्रगुप्त पूजा, भाई दूज और गोवर्धन (गोधन) पूजा तीनों त्योहार हैं जो हमारे जीवन में संबंध, जिम्मेदारी, आत्मविशेष और प्रकृति का सम्मान का संदेश देते हैं। ये न केवल धार्मिक परंपराएँ हैं, बल्कि हमने उन मूल्यों को भी समझाया है कि कैसे हमें अपने रिश्तों, धर्म, नैतिकता और पर्यावरण का ध्यान रखना चाहिए। इन त्योहारों का भावात्मक और सांस्कृतिक प्रभाव हमारे समाज की जड़ों को मजबूत करता है।

