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झारखंड के लिए पेसा कानून क्या है?

झारखंड के लिए पेसा कानून क्या है?

कैसे मजबूत होंगे आदिवासी, जानिए सब कुछ


झारखंड में पेसा कानून क्या है? ग्राम सभा और पंचायतों को कैसे मिली शक्ति, आदिवासी समाज को वास्तविक लाभ, पेसा कानून के प्रमुख बिंदु, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चुनौतियाँ – 

भूमिका: पेसा कानून क्यों ज़रूरी है?

भारत का आदिवासी समुदाय वर्षों से जल, जंगल और जमीन के साथ आत्मनिर्भर तरीके से जीवन यापन करता आ रहा है। हालाँकि, आधुनिक शासन व्यवस्था, औद्योगीकरण, खनन गतिविधियों और केंद्रीकृत प्रशासन के चलते आदिवासियों के पारंपरिक अधिकार लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। 

इसी संदर्भ में, पेसा कानून (Panchayats Extension to Scheduled Areas Act – 1996) को लागू किया गया, जिसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को स्वशासन का असली अधिकार प्रदान करना है। 

झारखंड जैसे राज्यों में, जहाँ लगभग 26% जनसंख्या आदिवासी है, पेसा कानून का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

पेसा कानून क्या है? (What is PESA Act?)

पेसा कानून 1996 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243M के तहत गढ़ित एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य है:

अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था को आदिवासी परंपराओं के अनुसार लागू करना।

पेसा कानून लागू होता है:

  • संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) में आने वाले क्षेत्रों में
  • जैसे – झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि

झारखंड में पेसा कानून का महत्व

झारखंड को 2000 में अलग राज्य का दर्जा मिला, लेकिन आज भी:

  • भूमि अधिग्रहण
  • खनन परियोजनाएँ
  • विस्थापन
  • आदिवासी संस्कृति पर अधिकाधिक 

 समस्याएँ बनी हुई हैं।

पेसा कानून इन समस्याओं के समाधान के लिए:

  • ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था बनाता है
  • बाहरी हस्तक्षेप का मार्ग अबरुद्धह करता है
  • पारंपरिक आदिवासी संस्थाओं को मान्यता देता है

ग्राम सभाएं और पंचायतें कैसे बनीं सशक्त?

1. ग्राम सभा को मिली सर्वोच्च शक्ति

पेसा कानून के तहत:

  • ग्राम सभा केवल सलाहकार नहीं, बल्कि निर्णायक संस्था है
  • पंचायतें ग्राम सभा के अधीन कार्य करती हैं

2. ग्राम सभा के प्रमुख अधिकार

ग्राम सभा को अधिकार है:

  • विकास योजनाओं की स्वीकृति
  • खनन व भूमि अधिग्रहण पर सहमति/असहमति
  • शराब बिक्री को नियंत्रित करना
  • लघु वन उपज (MFP) का प्रबंधन

➡️ यह पहली बार हुआ जब आदिवासियों को नीति निर्माण में भागीदारी मिली।

पेसा की संगठनिक जड़ें: आदिवासी समाज की परंपरा

पेसा कानून की आत्मा आधुनिक नहीं, बल्कि आदिवासी परंपरागत शासन व्यवस्था है।

आदिवासी समाज की विशेषताएँ:

  • सामूहिक निर्णय प्रणाली
  • मुखिया, मांझी, परगना जैसी संस्थाएँ
  • प्रकृति आधारित जीवन दर्शन
  • सहमति (Consensus) से निर्णय

पेसा कानून इन्हीं परंपराओं को संवैधानिक मान्यता देता है।

जनजातीय सम्मान की संरक्षा

1. संस्कृति और परंपरा की रक्षा

पेसा कानून के तहत:

  • आदिवासी रीति-रिवाजों को कानूनी मान्यता
  • धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की सुरक्षा
  • बाहरी सांस्कृतिक हस्तक्षेप पर नियंत्रण

2. सामाजिक न्याय की स्थापना

  • ग्राम सभा स्थानीय विवादों का समाधान कर सकती है
  • परंपरागत न्याय प्रणाली को बल मिलता है
  • महिलाओं और कमजोर वर्गों की भागीदारी बढ़ती है

क्या पेसा से आदिवासियों को वास्तविक लाभ हुआ?

सकारात्मक पक्ष (Benefits)

✅ ग्राम सभा की भूमिका मजबूत
✅ भूमि अधिग्रहण में आदिवासियों की सहमति अनिवार्य
✅ वन उपज से आजीविका में सुधार
✅ शराब नियंत्रण से सामाजिक सुधार
✅ स्थानीय नेतृत्व को बढ़ावा

झारखंड में पेसा कानून की स्थिति

 पेसा कानून 1996 से लागू है, लेकिन:

  • झारखंड में इसके नियमों को प्रभावी रूप से लागू करने में देरी हुई
  • कई जिलों में ग्राम सभा को वास्तविक शक्ति नहीं मिली
  • कई निर्णय अभी भी जिला प्रशासन द्वारा लिए जाते हैं

➡️ इससे स्पष्ट है कि कानून और ज़मीनी हकीकत में अंतर है।

पेसा कानून के प्रमुख बिंदु (Key Features of PESA Act)

पेसा रूल में ग्रामसभाओं को ‘शक्तिशाली’और ‘अधिकार संपन्न’बनाने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत ग्रामसभा की बैठकों की अध्यक्षता मानकी, मुंडा आदि पारंपरिक प्रधान ही करेंगे।

पंचायत सचिव ‘ग्रामसभा सचिव’के रूप में काम करेंगे। बैठकों में कोरम पूरा करने के लिये 1/3 सदस्यों की मौजूदगी जरूरी है। कोरम पूरा करने के लिये निर्धारित इस संख्या में 1/3 महिलाओं की उपस्थिति भी जरूरी है। ग्रामसभा की बैठक में अभद्र व्यवहार करने, अनुशासन तोड़नेवाले सदस्य को बैठक से निष्कासित करने का अधिकार सभा के अध्यक्ष को दिया गया है।

ग्रामसभा की सहमति के बिना जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा। ग्रामसभा का निर्णय ही अंतिम होगा। आदिवासियों की ज़मीन खरीद-बिक्री मामले में भी ग्रामसभा की सहमति की आवस्यक होगी ।

.ग्रामसभा गाँव में विधि-व्यवस्था जारी रखने  के उद्देश्य से आईपीसी की कुल-36 धाराओं के तहत अपराध करने वालों पर न्यूनतम 10 रुपए से अधिकतम 1000 रुपए तक का दंड लगाने का प्रबधान किया गया है ।

दंड की अपील पारंपरिक उच्च स्तर के बाद सीधे हाइकोर्ट में की जाएगी। पेसा रूल में पुलिस की भूमिका निर्धारित करते हुए किसी की गिरफ्तारी के 48 घंटे के अंदर गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी ग्रामसभा को देने की अनिबर्याता तय  की गई है

उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार द्वारा जारी पेसा रूल के प्रारूप पर 31 अगस्त तक आपत्तियाँ और सुझाव मांगे गए थे। इसके आलोक में कई संगठनों ने रूल के प्रारूप पर आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। साथ ही कई सुझाव भी दिये थे।

सरकार ने उन आपत्तियों और सुझावों को अस्वीकार कर दिया है, जो हाइकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और पेसा अधिनियम, झारखंड पंचायत राज अधिनियम-2001 के प्रावधानों के विपरीत थे। साथ ही नियम संगत सुझावों को स्वीकार करते हुए पेसा रूल-2022 को अंतिम रूप दिया है। इसमें कुल 17 अध्याय और 36 धाराएँ हैं।

पेसा रूल में ग्रामसभा में कोष स्थापित करने का प्रावधान किया गया है। इसे अन्न कोष, श्रम कोष, वस्तु कोष, नकद कोष के नाम से जाना जाएगा। नकद कोष में दान, प्रोत्साहन राशि, दंड, शुल्क, वन उपज से मिलने वाले रॉयल्टी, तालाब, बाजार आदि के लीज से मिलने वाली राशि रखी जाएगी। ग्रामसभा में बक्से में बंद कर अधिकतम 10 हज़ार रुपए ही रखे जाएंगे। इससे अधिक जमा हुई राशि को बैंक खाते में रखा जाएगा।

पैसा रुल के अनुसार ग्रामसभाएँ ही संविधान के अनुच्छेद-275(1) के तहत मिलनेवाले अनुदान और ज़िला खनिज विकास निधि (डीएमएफटी) से की जाने वाली योजनाओं का फैसला करेंगी। योजना के लाभुकों का चयन ग्रामसभा के माध्यम से किया जाएगा। विभाग द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं के लिये ग्राम सभा के द्वारा विचार-विमर्श करना होगा । 

पेसा रूल के प्रावधानों के सामाजिक, धार्मिक और प्रथा के प्रतिकूल होने की स्थिति में ग्रामसभा को इस पर आपत्ति दर्ज करने का अधिकार होगा। इस तरह के मामलों में ग्रामसभा प्रस्ताव पारित कर उपायुक्त के माध्यम से राज्य सरकार को भेजेगी।

सरकार 30 दिनों के अंदर एक उच्चस्तरीय समिति बनाएगी। यह समिति 90 दिनों के अंदर सरकार को अपनी रिपोर्ट देगी। रिपोर्ट के आधार पर सरकार फैसला करेगी और ग्रामसभा को सूचित करेगी।

वन उपज की सूची में बांस, झाड़-झंखाड़, ठूंठ, बेंत, तुसार, कोया, शहद, मोम, लाह, चार, महुआ, हर्रा, बहेरा, करंज, सरई, आंवला, रुगड़ा, तेंदू, केंदू पत्ता के अलावा औषधीय पौधों और जड़ी-बूटी को शामिल किया गया है।

ग्रामसभा को लघु खनिजों का अधिकार दिया गया है। ग्रामसभाएँ सामुदायिक संसाधनों का नियंत्रण समुदाय के पारंपरिक पद्धति और प्रथाओं से करेंगी। हालाँकि, इस दौरान विल्किसन रूल्स, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, संताल परगना काश्तकारी अधिनियम सहित अन्य कानूनों का ध्यान रखा जाएगा। पेसा और पंचायती राज: अंतर समझिए

बिंदुसामान्य पंचायतपेसा पंचायत
सर्वोच्च संस्थापंचायतग्राम सभा
संस्कृतिसामान्यआदिवासी परंपरा
भूमि अधिकारसीमितव्यापक
निर्णय प्रक्रियाबहुमतसहमति

पेसा कानून और संविधान

पेसा कानून का आधार:

  • अनुच्छेद 243 – पंचायती राज
  • पाँचवीं अनुसूची – आदिवासी क्षेत्र
  • अनुच्छेद 13 – परंपरागत कानून

➡️ यह कानून संविधान और आदिवासी अस्मिता का सेतु है।

भविष्य की राह: पेसा को कैसे प्रभावी बनाया जाए?

सुझाव:

  1. ग्राम सभा सदस्यों को प्रशिक्षण
  2. नियमों का सख्त पालन
  3. डिजिटल रिकॉर्ड और पारदर्शिता
  4. महिला भागीदारी बढ़ाना
  5. प्रशासन की जवाबदेही तय करना

निष्कर्ष: पेसा – केवल कानून नहीं, आत्मसम्मान का माध्यम

पेसा कानून:

  • आदिवासियों को भीख नहीं, अधिकार देता है
  • ग्राम सभा को शासन का केंद्र बनाता है
  • झारखंड में सच्चे लोकतंत्र की नींव रखता है

यदि पेसा कानून को सही ढंग से लागू किया जाए, तो:

झारखंड का आदिवासी समाज आत्मनिर्भर, सम्मानित और सशक्त बन सकता है।

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