
प्रस्तावना (Introduction)
झारखंड की मिट्टी हरे भरे जंगलों और पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध है पहाड़ों की गोद में आदिवासी अपना जीवन जीते और उनका सदियों से चला हुआ भोजन जो प्राकृतिक रूप से उपजने वाली यानी मोटा अनाज मडूवा इसके आज की भाषा में रागी कहा जाते हैं । आदिबासियों का मुख्य भोजन है । यह सिर्फ फसल ही नहीं झारखंड के आदिवासी समाज की भावनाओं मेंसे से जुड़ा हुआ है । कभी इसे गरीबों का अनाज कह कर संबोधित किया जाता था लेकिन मडूवा आज सुपर फूड बनकर उभर गया है ,जो अब गरीबों का थाली से हटकर शहरों में बड़े लोगों के थाली की सजावट और हेल्थ डाइट बना हुआ है । महुआ ने यह साबित कर दिया है सादगी में ही असली ताकत होती है ।
मड़ुआ / रागी क्या है?
✦ मड़ुआ / रागी क्या है?
मड़ुआ एक मोटा अनाज (Millet) है, जो कम पानी और कम खाद और बिभिन्न कठिन परिस्थितियों में आसानी से उगाया जाता है। झारखंड में इसे अलग-अलग क्षेत्रों में मड़ुआ या रागी कहा जाता है।
खेती का तरीका
मड़ुआ की खेती पारंपरिक तरीकों से होती है। इसे बारिश पर आधारित पहाड़ी और पथरीली जमीन, जहां धान या गेहूं उगाना मुश्किल होता है, वहां मड़ुआ आराम से उपजता है।
आदिवासी किसान आज भी बीजों को संभालकर रखते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी इसकी खेती करते आ रहे हैं।
झारखंड के प्रमुख जिले
झारखंड के कई जिलों में मड़ुआ व्यापक रूप से उगाया जाता है, जैसे—
- रांची
- गुमला
- खूंटी
- सिमडेगा
- लोहरदगा
- पश्चिमी सिंहभूम
- लातेहार
इन इलाकों में मड़ुआ भोजन के रूप मे इस्तेमाल होता है, बल्कि जीवन का आधार भी है।
झारखंड में मड़ुआ का सांस्कृतिक महत्व
आदिवासी समाज में उपयोग
झारखंड के आदिवासी समाज में मड़ुआ नियमित रूप से भोजन का अहम हिस्सा रहा है। खेत में दिनभर मेहनत करने के बाद मड़ुआ की रोटी या सत्तू शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है।
बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी की थाली में मड़ुआ की जगह तय है। नए उम्र के लोग इसे भोजन के रूप मे काम इस्तेमाल करते हैं।
त्योहार और उपवास से जुड़ाव
सरहुल, करमा, सोहराय जैसे त्योहारों में मड़ुआ से बने व्यंजन विशेष रूप से बनाए जाते हैं। कई परिवारों में उपवास के दौरान मड़ुआ का सेवन शुद्ध और सात्विक भोजन माना जाता है।
मेहनतकश जीवन का साथी
मड़ुआ आदिवासी जीवन का एक हिस्सा होने के नाते सादा मजबूत और भरोसेमंद है। यह उस जीवनशैली का प्रतीक है, जिसमें प्रकृति के साथ संतुलन और आत्मनिर्भरता सबसे बड़ा मूल्य है।
झारखंड के स्वादिष्ट मड़ुआ फूड
मड़ुआ की रोटी
मड़ुआ की रोटी झारखंड की पहचान है। इसे चूल्हे पर धीमी आंच में सेंका जाता है। इसे साग के साथ खाने से स्वाद और भी बढ़ जाता है।
मड़ुआ का ढुसका
ढुसका आमतौर पर चावल से बनता है, लेकिन मड़ुआ से बना ढुसका ज्यादा पौष्टिक और देसी स्वाद वाला होता है। हरी चटनी या आलू की सब्ज़ी के साथ गजब का जायका लाजवाव लगता है।
मड़ुआ का लड्डू
गुड़ और घी से बने मड़ुआ के लड्डू स्वाद के साथ ताकत भी देते हैं। सर्दियों में यह खास तौर पर बनाए जाते हैं।
मड़ुआ का सत्तू
भुने मड़ुआ का सत्तू गर्मी में शरीर को ठंडक देता है और लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखता है।
मड़ुआ की खीर
दूध और गुड़ से बनी मड़ुआ की खीर पारंपरिक मिठाई है, जो त्योहारों और खास अवसरों पर बनाई जाती है।
मड़ुआ का चिलका / पुआ
हल्का मीठा, कुरकुरा और खुशबूदार—मड़ुआ का पुआ या चिलका हर उम्र के लोगों को पसंद आता है।
स्वास्थ्य के लिए मड़ुआ के फायदे
डायबिटीज़ रोग में लाभकारी
मड़ुआ का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ाता है। इसलिए यह मधुमेह रोगियों के लिए बेहद उपयोगी है।
हड्डियों के लिए वरदान
मड़ुआ में कैल्शियम की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है।
आयरन और फाइबर से भरपूर
यह खून की कमी को दूर करता है ,और पाचनतंत्र को मजबूत रखता है ।
बच्चों और बुजुर्गों के लिए उपयोगी
बच्चों के विकास और बुजुर्गों की कमजोरी दूर करने में मड़ुआ बेहद लाभकारी होता है।
आज के दौर में मड़ुआ की वापसी
शहरों में रागी का बढ़ता प्रचलन
आज महानगर में रागी का डोसा, कुकीज़ और बिस्किट खूब पसंद किए जा रहे हैं। लोग देसी और स्वस्थ्य बिकल्प की ओर लौट रहे हैं।
ऑर्गेनिक और मिलेट मिशन
सरकार द्वारा मिलेट मिशन और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने से मड़ुआ को नई पहचान मिल रही है।
झारखंड के किसानों के लिए अवसर
मड़ुआ घरेलू उपयोग से बढ़कर मार्केटिंग और प्रसस्टिकरण से किसानों की आय बढ़ रही है।
निष्कर्ष
मड़ुआ एक अनाज नहीं, बल्कि स्वाद, सेहत और संस्कृति का मिलन है।
यह झारखंड की पहचान का प्रतीक है, जिसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, लेकिन आज वही पहचान पूरे देश में सम्मान पा रही है।
मड़ुआ को अपनाना मतलब—अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपने किसानों को

