भारत का सिद्दी समुदाय: अफ़्रीकी जड़ों वाला एक
अद्वितीय भारतीय इतिहास.
भारत में, विशेष रूप से “साउथ अफ्रीकन” देश के लोगों का कोई विशिष्ट गाँव नहीं है, लेकिन अफ़्रीकी मूल के लोगों की एक बहुत पुरानी और मशहूर कम्युनिटी है जिसे सिद्दी समुदाय (Siddi Community) कहा जाता है।
ये लोग मुख्य रूप से गुजरात के जाम्बूर (Jambur) गाँव में रहते हैं, जो गिर सोमनाथ जिले के पास स्थित है। जाम्बूर को अक्सर ‘भारत का मिनी-अफ़्रीका’ भी कहा जाता है।
सिद्दी लोग सदियों पहले अफ़्रीका से भारत आए थे। अब वे पूरी तरह से भारतीय हैं, गुजराती बोलते हैं, और उन्होंने यहाँ की संस्कृति को अपना लिया है। यह समुदाय गुजरात के अलावा कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी पाया जाता है।
भारत का सिद्दी समुदाय: अफ़्रीकी जड़ों वाला एक अद्वितीय भारतीय इतिहास
सिद्दी समुदाय भारत की असाधारण सांस्कृतिक विविधता का एक जीता-जागता प्रमाण है। ये वे लोग हैं जिनकी जड़ें अफ़्रीका में हैं, लेकिन जिन्होंने सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप को अपना घर बना लिया है। ये इतिहास, संस्कृति और पहचान का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं, जो हमें भारत और अफ़्रीका के बीच प्राचीन समुद्री संबंधों की याद दिलाता है।
यह लेख सिद्दी समुदाय के ऐतिहासिक आगमन, उनकी सांस्कृतिक विरासत, भारत के विभिन्न राज्यों में उनके वितरण और एक हाशिए पर पड़े समुदाय के रूप में उनके सामने आने वाली वर्तमान सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का विस्तृत विश्लेषण करता है।
१. सिद्दी समुदाय का ऐतिहासिक आगमन
सिद्दी लोग मुख्य रूप से बाँटू (Bantu) जनजाति से संबंधित माने जाते हैं, जो पूर्वी अफ़्रीका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र से आए थे। भारत में उनका आगमन कोई एक घटना नहीं थी, बल्कि कई शताब्दियों तक चली एक जटिल प्रक्रिया थी, जिसके तीन मुख्य कारण माने जाते हैं:
क. दास व्यापार और सैन्य सेवा (७वीं से १९वीं शताब्दी)
भारत में सिद्दियों के आने का सबसे पहला और मुख्य कारण अरब और यूरोपीय शक्तियों द्वारा किया गया दास व्यापार था।
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अरब आगमन (७वीं शताब्दी): सिद्दियों का पहला उल्लेख ७वीं शताब्दी के आस-पास मिलता है, जब उन्हें अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी तटों पर लाए थे।
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सैन्य भूमिका: कई सिद्दी, अपनी शारीरिक शक्ति और युद्ध कौशल के कारण, भारतीय शासकों, विशेष रूप से दक्कन के सुल्तानों और गुजरात के नवाबों के लिए एक मूल्यवान सैन्य बल बन गए। उन्हें अक्सर घुड़सवार (cavalry) और तोपखाने (artillery) में रखा जाता था।
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महत्वपूर्ण पद: इतिहास में कई सिद्दी सैनिक ऊँचे पदों तक पहुँचे। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है मलिक अंबर (१५४८-१६२६), जो वर्तमान इथियोपिया में जन्मे थे। उन्होंने अपनी सैन्य और प्रशासनिक प्रतिभा के बल पर अहमदनगर सल्तनत के पेशवा (प्रधानमंत्री) का पद संभाला और मुगलों को कड़ी टक्कर दी। मलिक अंबर की कहानी सिद्दियों के उस दौर के प्रभाव को दर्शाती है।
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पुर्तगाली और ब्रिटिश काल: बाद में, पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने भी उन्हें दास के रूप में भारत लाया। इनमें से कई लोगों को भारत के पश्चिमी तटों (गोवा, दमन, दीव) पर मज़दूरों और घरेलू कर्मचारियों के रूप में रखा गया।
ख. व्यापारी और नाविक
सिद्दियों का एक छोटा वर्ग दासता के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र व्यापारी (freemen) और नाविक (sailors) के रूप में भी आया। वे भारतीय और पूर्वी अफ़्रीकी तटों के बीच होने वाले समुद्री व्यापार में शामिल थे। इन नाविकों ने धीरे-धीरे गुजरात और कर्नाटक के बंदरगाह शहरों के पास स्थायी बस्तियाँ बसा लीं।
ग. नवाबों के निजी सेवक
गुजरात के जूनागढ़ के नवाब जैसे कई शासकों ने अफ्रीकी लोगों को अपनी सेना और निजी सुरक्षा के लिए विशेष रूप से भर्ती किया था। इन लोगों को “हमी-सिद्दी” कहा जाता था। जब रियासतें खत्म हुईं, तो ये लोग अपने मूल स्थानों के आस-पास ही बस गए, और जाम्बूर जैसे गाँवों का निर्माण हुआ।
इस प्रकार, सिद्दी समुदाय को उनके वंश और इतिहास के आधार पर “अफ़्रीकी-भारतीय” (Afro-Indian) या “इंडो-अफ़्रीकी” (Indo-African) समुदाय कहा जाता है।
२. भारत में सिद्दियों का भौगोलिक वितरण
सिद्दी समुदाय भारत के कई राज्यों में बिखरा हुआ है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी और सघन आबादी पश्चिमी और दक्षिणी भारत में पाई जाती है:
क. गुजरात (सबसे बड़ी आबादी)
गुजरात में सिद्दी सबसे अधिक संख्या में पाए जाते हैं।
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जाम्बूर गाँव (Jambur): गिर सोमनाथ जिले में स्थित जाम्बूर, गिर के जंगल के पास, सिद्दी समुदाय का सबसे प्रसिद्ध और केंद्रीय स्थान है। इस गाँव को “मिनी-अफ़्रीका” (Mini-Africa) के नाम से जाना जाता है। यहाँ के लोग अपनी अफ़्रीकी जड़ों को बनाए रखते हुए पूरी तरह से गुजराती भाषा बोलते हैं और स्थानीय वेशभूषा, भोजन और रीति-रिवाजों को अपनाते हैं।
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जूनागढ़ और भावनगर: सिद्दी यहाँ भी छोटी बस्तियों में रहते हैं और मुख्य रूप से सूफी इस्लाम के अनुयायी हैं।
ख. कर्नाटक
कर्नाटक में सिद्दी मुख्य रूप से उत्तर कन्नड़ जिले (North Canara) में पाए जाते हैं।
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येल्यापुर (Yellapur), अत्तिकट्टा, हलीयाल: इन क्षेत्रों में रहने वाले सिद्दी, जंगल और वन्यजीवों के साथ निकटता से जुड़े हुए हैं। वे कन्नड़ भाषा बोलते हैं और धर्म के मामले में इस्लाम, हिंदू धर्म (विशेषकर शिमोगा क्षेत्र में) और कुछ ईसाई धर्म को भी मानते हैं। कर्नाटक के सिद्दी, विशेष रूप से, अपनी आजीविका के लिए खेती और जंगल की लकड़ी काटने पर निर्भर हैं।
ग. महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हैदराबाद
महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र (जैसे रत्नागिरी) और हैदराबाद (तेलंगाना/आंध्र प्रदेश) में भी सिद्दी समुदाय के छोटे समूह मौजूद हैं। हैदराबाद में, उन्हें कभी-कभी “हबशी” (Habshi) भी कहा जाता है, जहाँ वे ऐतिहासिक रूप से निज़ाम की सेना और घुड़सवार टुकड़ियों का हिस्सा थे।
३. सांस्कृतिक विरासत और मिश्रण (कल्चरल ब्लेंड)
सिद्दी समुदाय की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी अफ़्रीकी पहचान को भारतीय संस्कृति के साथ खूबसूरती से मिश्रित किया है।
क. भाषा और धर्म
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भाषा: सिद्दी अपनी कोई अफ़्रीकी मूल भाषा नहीं बोलते हैं। उनकी मातृभाषा वह क्षेत्रीय भाषा है जहाँ वे रहते हैं, जैसे गुजराती, कन्नड़ या कोंकणी।
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धर्म: सिद्दी मुख्य रूप से इस्लाम के अनुयायी हैं (विशेषकर गुजरात में), लेकिन कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में हिंदू और ईसाई सिद्दी भी पाए जाते हैं। उनकी धार्मिक प्रथाओं में भी स्थानीय और सूफी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
ख. संगीत और नृत्य: धमाल और गोमा
सिद्दियों ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान को संगीत और नृत्य के माध्यम से जीवित रखा है।
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गोमा (Goma): यह सिद्दियों का पारंपरिक अफ़्रीकी संगीत और नृत्य रूप है, जो ‘धमाल’ (Dhamal) के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। धमाल नृत्य में बड़े ड्रमों (ड्रमों का स्थानीय नाम ‘मसरानी’ या ‘दमामा’ हो सकता है) और लयबद्ध संगीत का उपयोग होता है, जिसमें सिद्दी अपनी ऊर्जा और अफ़्रीकी ताल को प्रदर्शित करते हैं।
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नृत्य शैली: धमाल नृत्य में जानवरों के शिकार (lion dance), फसल काटने और उत्सव मनाने के दृश्य शामिल होते हैं। इसे अक्सर सूफी दरगाहों पर या धार्मिक और सामाजिक समारोहों में प्रस्तुत किया जाता है। यह उनकी एकमात्र सांस्कृतिक कड़ी है जो उन्हें सीधे अफ़्रीकी महाद्वीप से जोड़ती है।
ग. वेशभूषा और रीति-रिवाज
दैनिक जीवन में, सिद्दी पूरी तरह से भारतीय समुदायों की तरह कपड़े पहनते हैं और जीवन जीते हैं। गुजरात में पुरुष धोती या पतलून और महिलाएँ साड़ी या सलवार कमीज़ पहनती हैं। उनका खान-पान भी पूरी तरह से स्थानीय गुजराती या कन्नड़ व्यंजनों पर आधारित है।
४. सामाजिक-आर्थिक स्थिति और चुनौतियाँ
एक हज़ार साल से भारत में रहने के बावजूद, सिद्दी समुदाय आज भी देश के सबसे अधिक हाशिए पर पड़े (marginalized) और वंचित (disadvantaged) समूहों में से एक है।
क. पहचान का संकट
सिद्दियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनकी जातीय पहचान (ethnic identity) को लेकर है। उन्हें न तो मुख्यधारा के भारतीय समुदाय का हिस्सा माना जाता है और न ही उन्हें उनके अफ़्रीकी वंश के कारण बाहर से आए लोग समझा जाता है। यह स्थिति अक्सर उन्हें सामाजिक बहिष्करण (social exclusion) और भेदभाव का शिकार बनाती है।
ख. आजीविका और ग़रीबी
वन्य क्षेत्र पर निर्भरता:
विशेष रूप से कर्नाटक और गिर के जंगल के पास रहने वाले सिद्दी मुख्य रूप से खेती, वन उत्पादों के संग्रह और मज़दूरी पर निर्भर हैं। उनकी आय का साधन सीमित और अनिश्चित होता है।
ग़रीबी: समुदाय में ग़रीबी दर बहुत अधिक है। अधिकांश परिवार दैनिक मज़दूरी पर निर्भर करते हैं, और उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (welfare schemes) का पूरा लाभ अक्सर नहीं मिल पाता है।
शिक्षा का अभाव: आर्थिक तंगी और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने के कारण, शिक्षा का स्तर कम है। बच्चे अक्सर प्राथमिक शिक्षा के बाद स्कूल छोड़ देते हैं, जिससे अच्छी नौकरियाँ मिलने की संभावना कम हो जाती है।
ग. आरक्षण और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe – ST) का दर्जा
सिद्दी समुदाय लंबे समय से आरक्षण और अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
गुजरात में ST दर्जा: गुजरात में सिद्दियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ का दर्जा प्राप्त है, जिससे उन्हें शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कुछ लाभ मिलता है।
कर्नाटक में मांग: कर्नाटक में, सिद्दियों को पहले ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में मान्यता नहीं मिली थी, जिससे वे सरकारी लाभों से वंचित थे। लंबी लड़ाई के बाद, उन्हें आंशिक रूप से मान्यता मिली, लेकिन आज भी पूर्ण और प्रभावी कार्यान्वयन (effective implementation) की आवश्यकता बनी हुई है।
घ. खेल में योगदान
इन चुनौतियों के बावजूद, सिद्दी समुदाय ने भारतीय खेल जगत, विशेष रूप से एथलेटिक्स (Athletics), में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उनकी अफ़्रीकी आनुवंशिक विरासत (genetic heritage) उन्हें दौड़ने और अन्य शारीरिक रूप से ज़ोरदार खेलों में स्वाभाविक रूप से सक्षम बनाती है। कई सिद्दी युवाओं ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है, जो उनकी क्षमता और दृढ़ता को दर्शाता है।
५. जाम्बूर: मिनी-अफ़्रीका का दर्पण
जाम्बूर गाँव सिद्दी समुदाय के लिए सिर्फ एक निवास स्थान नहीं, बल्कि उनकी पहचान का केंद्र है।
जीवनशैली: यहाँ का जीवन अन्य भारतीय गाँवों जैसा ही है—लोग खेती करते हैं, बाज़ार जाते हैं, और एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। लेकिन यहाँ की सबसे आकर्षक बात है उनकी शारीरिक बनावट—घुंघराले बाल, गहरे रंग की त्वचा और मजबूत कद-काठी—जो तुरंत उन्हें अफ़्रीकी मूल का दर्शाती है।
सांस्कृतिक पर्यटन: जाम्बूर हाल के वर्षों में एक सांस्कृतिक पर्यटन (cultural tourism) केंद्र के रूप में उभरा है। पर्यटक यहाँ आकर सिद्दियों के धमाल नृत्य को देखते हैं, उनकी कहानियाँ सुनते हैं और इस अनूठे सांस्कृतिक मिश्रण का अनुभव करते हैं। यह पर्यटन उनके लिए आय का एक छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण स्रोत बन रहा है।
आधुनिकता और परंपरा: जाम्बूर आज़ादी के बाद से तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है। अब वहाँ पक्के मकान, बिजली और बेहतर सड़कें हैं, लेकिन समुदाय ने अपनी परंपराओं, विशेष रूप से धमाल नृत्य, को पूरी लगन से संरक्षित रखा है।
६ .”रिदम ऑफ दमाम” फिल्म से चर्चा में आया सिद्धी समुदाय: किस हाल में है 7वीं सदी में अरबों द्वारा भारत लाया गया यह अफ्रीकी समूह?
“रिदम ऑफ दमाम” (2024), एक महत्वपूर्ण फिल्म जो सिद्धी समुदाय की कहानी को उजागर करती है, 29वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ केरला (IFFK) में प्रदर्शित होगी। यह फिल्म 13 से 20 दिसंबर तक तिरुवनंतपुरम में आयोजित इस महोत्सव में “इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन” श्रेणी में दिखाई जाएगी। सिद्धी समुदाय एक एथनिक अफ्रीकी समूह है, जो 7वीं सदी में अरबों द्वारा भारत लाया गया था।
“रिदम ऑफ दमाम” कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के येल्लापुर में सेट है, जहां हिंदू सिद्दियों की एक बड़ी आबादी रहती है। फिल्म के मुख्य कलाकार सभी गैर-कलाकार समुदाय से हैं। फिल्म में चिनामया सिद्धी ने फिल्म में जयाराम सिद्धी की प्रमुख भूमिका निभाई है। जबकि अन्य कलाकारों में प्रशांत सिद्धी , गिरिजा सिद्धी, नागराज सिद्धी एव मोहन सिद्धी ने अभिनय किया है।
फिल्म में 12 साल के जयाराम सिद्धी की कहानी है, जो अपने मृत दादा की आत्मा से प्रेतबाधित है। चाहे वह स्थानीय काले जादूगरों से मदद ले या अन्य उपाय करे, जयाराम की हालत में कोई सुधार नहीं होता। आखिरकार, वह एक सपने की दुनिया में भाग जाता है, जहाँ वह अपने दादा के जादुई उपकरणों का उपयोग करके अपने पूर्वजों से जुड़ता है। वह अपनी पूर्वजों की दर्दनाक गुलामी की इतिहास से अभिभूत हो जाता है और वास्तविकता से जुड़ने में असमर्थ हो जाता है। परिवार जयाराम की स्थिति सुधारने के लिए आदिवासी अनुष्ठान और दमाम संगीत का सहारा लेता है।
इस फिल्म के निर्देशक जयान चेरियन हैं, जो केरल से हैं और जिनके पास सिटी कॉलेज न्यू यॉर्क से फिल्म निर्माण में मास्टर डिग्री (MFA) है। उन्होंने हंटर कॉलेज से फिल्म और क्रिएटिव राइटिंग में बीए भी किया है। चेरियन की फिल्में दुनियाभर के फिल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी हैं, जिनमें बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, डर्बन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, बीएफआई लंदन लेस्बियन और गे फिल्म फेस्टिवल, कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, और मॉन्ट्रियल वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल शामिल हैं। उनके कुछ प्रमुख फिल्म प्रोजेक्ट्स में “का बॉडीस्केप्स” (2016), “पापीलियो बुद्धा” (2013) और “द शेप ऑफ द शेपलेस” (2010) शामिल हैं।
इस फ़िल्म का प्रीमियर नवंबर में गोवा में 55वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में भी हुआ था। “रिदम ऑफ दमाम एक समुदाय की परेशानियों पर अपनी सहानुभूतिपूर्ण रोशनी डालती है। लेकिन यह फिल्म न केवल उन लोगों को आवाज़ देती है जो बेज़ुबान हैं, बल्कि यह उन सभी लोगों से भी बात करती है जो खुद को इतिहास के एक कोने में पाते हैं।
७. राष्ट्रपति मुर्मू का सिद्दी समुदाय से संवाद: शिक्षा, अधिकार और समावेशी विकास की दिशा में प्रेरक पहल
गुजरात के जूनागढ़ ज़िले में 10 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सिद्दी समुदाय के सदस्यों से मुलाक़ात की और संवाद स्थापित किया। अफ्रीकी मूल की यह विशेष जनजाति भारत में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में जानी जाती है। राष्ट्रपति की यह यात्रा आदिवासी सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही।
शिक्षा को बताया सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम
राष्ट्रपति मुर्मू ने इस अवसर पर सिद्दी समुदाय की 72% से अधिक साक्षरता दर की सराहना करते हुए कहा कि शिक्षा न केवल व्यक्तिगत प्रगति का साधन है, बल्कि समुदाय के समग्र विकास की कुंजी भी है। उन्होंने युवाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और कहा कि शिक्षा के माध्यम से ही आत्मनिर्भरता और सम्मान प्राप्त किया जा सकता है।
कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी को बताया आवश्यक
राष्ट्रपति ने सिद्दी समुदाय से अपील की कि वे केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे जनजातीय कल्याण और विकास कार्यक्रमों की जानकारी रखें और इनका लाभ उठाएं। साथ ही उन्होंने कहा कि यह जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रहकर पूरे गाँव और समुदाय के लिए साझा प्रयास बननी चाहिए।
प्रकृति-मैत्रीपूर्ण जीवनशैली और संस्कृति की सराहना
राष्ट्रपति मुर्मू ने आदिवासी समाज की प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली को “सतत जीवन” का उदाहरण बताया और कहा कि यह आज की वैश्विक जलवायु चुनौतियों के बीच एक प्रेरणादायक मार्ग है। उन्होंने यह भी कहा कि एक न्यायसंगत और समावेशी समाज के निर्माण में आदिवासी समुदायों की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सिद्दी समुदाय भारत का एकमात्र अफ्रीकी मूल का जनजातीय समूह है, जो मुख्यतः गुजरात, कर्नाटक और गोवा में निवास करता है।
- भारत में वर्तमान में 75 जनजातियों को PVTG के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं एक आदिवासी समुदाय (संथाल) से संबंधित हैं और भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं।
सिद्दी समुदाय एक हज़ार साल से अधिक के इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। वे भारत की उस कहानी का हिस्सा हैं, जो यह बताती है कि कैसे इस उपमहाद्वीप ने विभिन्न जातियों, धर्मों और नस्लों के लोगों को गले लगाया है। एक सैन्य शक्ति के रूप में शुरू होकर एक हाशिए पर पड़े, लेकिन गर्वित नागरिक समुदाय बनने तक का उनका सफर असाधारण रहा है।
हालांकि वे अब अपनी कोई अफ़्रीकी भाषा नहीं बोलते और पूरी तरह से भारतीय संस्कृति में समाहित हो चुके हैं, फिर भी उनके संगीत, उनके नृत्य और उनकी शारीरिक बनावट में उनकी अफ़्रीकी जड़ें ज़िंदा हैं। सिद्दी भारत को सिर्फ एक भूमि के टुकड़े के रूप में नहीं, बल्कि अपने घर और अपनी पहचान के रूप में देखते हैं।
९ .आपके लिए
भारत की सामाजिक और प्रशासनिक संस्थाओं के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे सिद्दी समुदाय को उनकी ऐतिहासिक पहचान और उनके सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के अनुरूप उचित सहायता और अवसर प्रदान करें, ताकि यह अद्वितीय सांस्कृतिक संगम भारत की प्रगति में पूरी तरह से योगदान दे सके। उनका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भारतीय समाज उन्हें कितनी सहजता और सम्मान के साथ गले लगाता है, और उन्हें मुख्यधारा में आने के लिए कितने अवसर प्रदान करता है।
यह लेख सिद्दी समुदाय के बहुआयामी इतिहास, उनकी जीवंत संस्कृति और उनके सामने खड़ी चुनौतियों का विस्तार से वर्णन करता है। यह एक ऐसा समुदाय है जो भारत की अतुल्य विविधता को और भी समृद्ध बनाता है।

