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झारखंड में चिकित्सा व्यवस्था: झारखंड गठन से आज तक.

झारखंड की स्वास्थ्य ब्यबस्था .अद्यतन प्रगति .

झारखंड राज्य की स्थापना 15 नवंबर 2000 को हुई थी। उस समय राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं बहुत ही दयनीय स्थिति में थीं। आज भी कई इतनी प्रगति के पश्चात दयनीय  हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में चिकित्सा व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है।

राज्य गठन के समय (वर्ष 2000)

स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) की कमी थी, जिससे ग्रामीण इलाकों में चिकित्सा सेवा हस्तक्षेप सही ढंग से नहीं हो पा रहा था। इन क्षेत्रों में चिकित्सा सहायता तक पहुंच सीमित थी, और कई बार मरीजों को आपात स्थिति में भी इलाज के लिए शहरों का सहारा लेना पड़ता था।

राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार: हाल के वर्षों में झारखंड की स्वास्थ्य सेवाओं में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिला है। नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की वृद्धि से स्थिति में बदलाव आया है। इसके अलावा, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए विशेष योजनाएं बनाई हैं।

आगामी चुनौतियाँ: फिर भी, चिकित्सा क्षेत्र में अभी भी कई चुनौतियाँ बरकरार हैं। डॉक्टरों की संख्या में कमी और स्वास्थ्य केंद्रों में संसाधनों की उपलब्धता बढ़ाने की आवश्यकता है। साथ ही, शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करने की दिशा में काम करना आवश्यक है।

शुरुआती वर्षों में विकास (2000-2010)

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM): झारखंड राज्य के गठन के बाद, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) योजना को लागू किया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) की संख्या को बढ़ाना था। इसके अंतर्गत, सब-सेंटर और PHC की संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि की गई।

मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि: प्रारंभिक वर्षों में, झारखंड में मेडिकल कॉलेजों की संख्या नौ तक पहुँच गई। रांची, जमशेदपुर और दुमका जैसे प्रमुख शहरों में नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की गई, जिससे डॉक्टरों की पढ़ाई का अवसर बढ़ा।

अस्पतालों का जाल: 

इस दशक में सरकारी अस्पतालों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। जिला अस्पतालों की संख्या बढ़कर 23 हो गई, अनुमंडल अस्पतालों की संख्या 13 तक पहुंच गई। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) की संख्या 188 और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) की संख्या 330 हो गई। कुल मिलाकर, राज्य में 4,460 सरकारी स्वास्थ्य इकाइयों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हुआ।
आयुष्मान भारत योजना का शुभारंभ: वर्ष 2018 में, केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना झारखंड में लागू की गई। इस योजना ने स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांति ला दी। इसके तहत, लगभग 80-90% आबादी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त या बहुत कम खर्च पर इलाज पाने की हकदार बन गई। इस योजना ने प्राइवेट अस्पतालों के साथ भी आउटसोर्सिंग का रास्ता खोला।
कोविड-19 महामारी का सामना: कोरोना महामारी के आने से पहले, झारखंड में RT-PCR जांच की सुविधा बहुत सीमित थी। लेकिन महामारी के दौरान, राज्य सरकार ने अभूतपूर्व तेजी दिखाते हुए सभी जिलों में जांच की सुविधा उपलब्ध कराई। सरकारी अस्पतालों ने इस चुनौती का डटकर सामना किया।
आयुष विभाग की सक्रियता: इस दौरान आयुष (आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) विभाग ने भी गति पकड़ी। वर्ष 2022 में, राज्य सरकार ने सभी जिलों में 10-10 बिस्तर वाले आयुष अस्पताल खोलने का आदेश दिया। इससे एलोपैथी के साथ-साथ पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को भी बढ़ावा मिला।
मेडिकल कॉलेजों की संख्या में भारी वृद्धि: मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 20 से भी अधिक हो गई। सुपर स्पेशियलिटी सेंटरों का निर्माण कार्य भी शुरू हुआ, हालांकि अभी भी इनकी कमी महसूस की जाती है और गंभीर बीमारियों के लिए मरीजों को बाहर जाना पड़ता है।
विशेषज्ञों की राय: डॉ. प्रवीण चंद्रा जैसे विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सब-सेंटरों को और मजबूत करने की आवश्यकता है। प्रत्येक सब-सेंटर में एक ANM, एक नर्स और सप्ताह में कम से कम एक दिन डॉक्टर की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए, ताकि गांव स्तर पर ही लोगों को बुनियादी इलाज मिल सके।
  • ग्रामीण चिकित्सकों का योगदान: आज के समय में, पश्चिमी सिंहभूम जैसे क्षेत्रों में ज्योति प्रभा किस्पोट्टा जैसे ग्रामीण चिकित्सकों ने गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब सरकारी डॉक्टर उपलब्ध नहीं होते, तब ये स्थानीय चिकित्सक समुदाय के लिए एक भरोसेमंद सहारा बन जाते हैं।
  • बनी हुई चुनौतियां: हालांकि इन प्रयासों के बावजूद, डॉक्टरों की कमी एक महत्वपूर्ण समस्या बनी हुई है। एक सरकारी डॉक्टर पर अभी भी 18,518 लोग निर्भर हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से कहीं ज्यादा है। इलाज का प्राथमिक ध्यान ‘उपचार’ पर केंद्रित है, जबकि ‘रोकथाम’ पर कम ध्यान दिया जा रहा है।

वर्तमान स्थिति (2020-2025)

संरचित स्वास्थ्य इकाइयों का जाल: वर्तमान में झारखंड में 4,460 स्वास्थ्य इकाइयां सक्रिय हैं, लेकिन सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता बनी हुई है। स्वास्थ्य क्षेत्र में यह राज्य केरला और तमिलनाडु जैसे प्रगतिशील राज्यों से पिछड़ा हुआ है।

सब-सेंटरों की स्थिति: सब-सेंटरों को स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी माना जा रहा है। कई सब-सेंटरों में कर्मचारियों की कमी दिखाई दे रही है और ये सरकारी सहायता पर निर्भर हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में RMP की भूमिका: पश्चिमी सिंहभूम जैसे कठिनाई भरे क्षेत्रों में, ज्योति प्रभा किस्पोट्टा जैसे RMP (रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर) आज भी गांव-गांव जाकर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं।

सरकार की प्राथमिकता:

झारखंड सरकार की मुख्य प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि सभी नागरिकों को सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। कोरोना काल में इस दिशा में स की कमी: झारखंड में डॉक्टरों की संख्या और जनता के बीच अनुपात अभी भी चिंताजनक स्थिति में है। वर्तमान में करीब 18,518 लोगों के लिए केवल एक डॉक्टर है, जो न केवल राष्ट्रीय औसत (11,082) से बल्कि WHO के मानकों से भी काफी नीचे है।

ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच: कई ग्रामीण इलाकों में आज भी सड़कों, बिजली और परिवहन की सुविधा का अभाव है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की मौजूदगी को सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की कमी: हृदय, गुर्दे, और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के लिए विशेषज्ञ अस्पतालों की भारी कमी पाई जाती है। ऐसे में, राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अक्सर उन मरीजों से भरी रहती हैं जो इलाज के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं।

सुधार के लिए विशेषज्ञों के सुझाव

सब-सेंटरों को सशक्त बनाना: हर सब-सेंटर में एएनएम और नर्सों की उचित संख्या में नियुक्ति करें और डॉक्टरों की सेवाओं को नियमित रूप से उपलब्ध कराएं।

निजी स्वास्थ्य सेवाओं का आउटसोर्सिंग: आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता को बढ़ाने के लिए निजी चिकित्सकों और अस्पतालों के सहयोग का लाभ उठाएं।

विशेषज्ञता के केंद्र स्थापित करें: गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए अत्याधुनिक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाएं, ताकि मरीजों को राज्य से बाहर जाने की आवश्यकता न पड़े।

आयुष अस्पतालों का विस्तार: सभी जिलों में आयुष अस्पतालों की स्थापना कर वैकल्पिक चिकित्सा के प्रसार को सुनिश्चित करें।

सकारात्मक बदलाव और भविष्य की ओर

मेडिकल कॉलेजों का विस्तार: शुरूआत में केवल तीन मेडिकल कॉलेज थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़कर 20 से ज्यादा हो गई है, जो नए डॉक्टरों की एक पूरी पीढ़ी को प्रशिक्षित कर रहे हैं।

डिजिटल स्वास्थ्य का विकास: टेलीमेडिसिन जैसी डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विकास हुआ है, जिसने कोरोना महामारी के दौरान बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महिला स्वास्थ्य में सुधार: एएनएम (आशा नर्सिंग मिडवाइफ) का बढ़ता संख्या और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर ध्यान देने से मातृ मृत्यु दर में कमी आई है।

जागरूकता और प्रशिक्षण: एएसआई जैसे संगठन चिकित्सा समुदाय में ज्ञान और कौशल बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

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