षटतिला एकादशी 2026: व्रत का महत्व, कथा और पूजा विधि
षटतिला एकादशी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। इस दिन तिल से जुड़े छह प्रकार के दान और पूजन का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यहाँ जानें षटतिला एकादशी का महत्व, व्रत कथा, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले धार्मिक नियमों की पूरी जानकारी।
षटतिला एकादशी का महत्व
माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम षटतिला एकादशी है। इस एकादशी का व्रत मनुष्य के संपूर्ण पाप विनाश करके मोक्ष प्रदान करने वाला है।
इस व्रत में तिलों का विशेष महत्व है। इस दिन छह प्रकार से तिलों का प्रयोग किया जाता है, तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का तर्पण, तिल का भोजन, तिल का स्नान, तिल का दान।
इसलिए इस एकादशी का नाम षटतिला एकादशी है। इस दिन तिलों का सेवन करने के साथ ही तिलों का दान करना भी विशेष महत्व रखता है।
शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य इस ब्रह्माण्ड के दिन तिल दान करता है, वह हजारों वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।
षटतिला एकादशी व्रत कथा
एक दल बार्भ्य ऋषि ने पुलस्तय ऋषि से पूछा, हे मुनिवर! संसार में सभी मनुष्य अनेक प्रकार के पाप कर्म करते हैं, क्योंकि वह अपने लिए नर्क के द्वार स्वयं खोल लेते हैं।
परंतु फिर भी सरकारी नौकरी प्राप्त नहीं होती। वह व्यक्ति क्या उपाय करता है? ऐसा क्या उपाय है जिससे पापी मनुष्य भी अपना काम कर सके और सद्गति प्राप्त कर सके?
पुलस्तय ऋषि बोले, हे ऋषि श्रेष्ठ! पवित्र माघ मास में जो मनुष्य अपने पापों का प्रायश्चित करके पवित्र नदियों में स्नान करता है, दान करता है, निवास करता है, सद्गति प्राप्त करता है।
माघ की षटतिला एकादशी का व्रत करें। इस दिन तिल के जल से स्नान करें, तिल का उबटन प्रयोग करें, तिल का उबटन प्रयोग करें, तिल का भोजन करें तथा तिल का दान करें।
इस व्रत की जो कथा है वह भी मैं नक्षत्र सुनाता हूं, एक बार नारद जी ने विष्णु भगवान से षटतिला ब्रह्माण्ड का महत्तव पूछा। तब भगवान विष्णु ने उन्हें जो कथा सुनाई थी, वही मैं नक्षत्र सुनाता हूं।
एक नगर में एक ब्राह्मणी निवास करता था। वह सदा ईश्वर के व्रत, पूजन आदि कर्मकाण्डों में व्यस्त रहती थी। सदैव ईश्वर का ध्यान, स्मरण रहता है।
एक बार वह एक माह तक की पदयात्रा पर निकला जिसके कारण उसका शरीर बहुत पतला हो गया। परंतु उसने कभी कुछ दान नहीं किया था।
जीवन भर मेरी भक्ति के कारण स्वर्ग की प्राप्ति तो निश्चित थी, लेकिन कभी भी दान न करने के कारण उसे स्वर्ग का सुख प्राप्त नहीं हो सकता था।
अत: उसके स्वामी के लिए मैं स्वयं ही एक याचक के रूप में उससे भिक्षा की मांग करने लगा। परंतु उसने मुझे भिक्षा में एक मिट्टी का पिंड दे दिया।
कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनका सूक्ष्म शरीर स्वर्ग प्राप्त हुआ। स्वर्ग में रहने के लिए उसे एक सुंदर महल प्राप्त हुआ, लेकिन वह महल पूर्णतः शून्य था।
अन्न, धन तथा किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं थी। वह ब्राह्मणी प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु मान जाओ तो जीवन भर तुम्हारी भक्ति की है। फिर मुझे यह खाली महल क्यों मिला है।
मैंने उससे कहा, तुम महल में जाओ और दरवाजा बंद कर लो। जब कन्या देवियाँ ब्रह्मांड करने आये तो कृपया षटतिला एकादशी के व्रत की विधि पूछना। जब वह विधि बताए तो द्वार खोलो।
उसने ऐसा ही किया। देव कन्याएँ उनके द्वार पर आई और उन्हें मछली लगी। उसने पहले मुझसे कहा षटतिला एकादशी के व्रत की विधि बताएं।
टैब एक कन्या देव विधि उन्हें बताएं। फिर ब्राह्मणी द्वार खोल दिया गया है। उसका बाद वह विधि-विधान असंबद्ध था षटतिला एकादशी का व्रत होता है।
व्रत का प्रभाव उनके महल से सभी सुख-वैभव की जयंती से होता है।
हे नारद! जो मनुष्य षटतिला एकादशी का व्रत करता है और इस दिन अन्न, धन और तिलों का दान करता है, इस लोक में भी धन-धान्य से युक्त होता है और स्वर्गलोक में भी सभी सुख भोगता है।
षटतिला एकादशी व्रत विधि
- इस व्रत की पूजा में तिलों का विशेष महत्व है।
- इस दिन प्रात: ब्रह्मा ब्रह्मा में उठें और स्नान के समय तिलों का उबटन प्रयोग करें तथा स्नान के जल में भी तिल डाल कर स्नान करें।
- इस दिन सूर्य भगवान को भी तिलयुक्त जल का अर्घ्य दें।
- इस दिन भगवान विष्णु की षोडशोपचार विधि से पूजा करें।
- धूप, कपूर और गाय के घी के दीपक से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जी की आरती करें।
- भगवान को तुलसी दल, पुष्प, ऋतु के फल, तथा तिल निर्भय करें।
- इस दिन भगवान विष्णु के मंत्र ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’ का 108 बार जाप करें और तिलों की 108 आहुति दें।
- पूरे दिन ईश्वर का ध्यान स्मरण में समय व्यतीत करें।
- रात्रि में जागरण और कीर्तन करें।
- द्वादशी के दिन प्रात: भगवान विष्णु की पूजा करें और इस दिन तिल के व्यंजन बनाकर भगवान को भोग लगाएं।
- ब्राह्मणो को भोजन सिखां। भोजन में तिल के व्यंजन अवश्य शामिल करें।
- फिर ब्राह्मणो को दक्षिणा में अन्न, धन और तिल दान करना चाहिए।
- इस दिन कोई मिट्टी का पात्र जैसे घड़े आदि का भी दान करें।
- उनका दूसरा व्रत उद्यम तथा स्वयं भी तिलयुक्त भोजन करें।
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