शरद पूर्णिमा व्रत विधि:
इस विशेष दिन की शुरुआत करते हुए, प्रात: काल स्नान करना आवश्यक है। स्नान के बाद, अपने आराध्य देव को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनकर उनका आवाहन करें। इसके पश्चात आसान, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी, और दक्षिणा जैसे सामग्रियों से उनका पूजन करें।
रात्रि के समय, गाय के दूध से बनी खीर में घी और चीनी मिलाकर इसे भगवान को अर्पित करें। अर्धरात्रि में इस भोग का भगवान द्वारा धारण किए जाने का ध्यान रखें। पूर्ण चंद्रमा की उपस्थिति में उनका पूजन करना न भूलें। खीर का नैवेद्य अर्पित करने के बाद, रात को भरपूर खीर लेकर खुले वातावरण में मित्रों के साथ मिलकर दूसरे दिन का भोजन करें। सबसे पहले अपने प्रसाद का सेवन करें।
इस प्रकार, शरद पूर्णिमा का व्रत भक्तिपूर्वक संपादित करें।
शरद पूर्णिमा की कथा (शरद पूर्णिमा व्रत कथा हिंदी में)
एक साहूकार की दो बेटियाँ थीं। ये दोनों प्रत्येक पूर्णमासी का व्रत करती थीं। बड़ी बहन व्रत को पूरी निष्ठा से निभाती थी, जबकि छोटी बहन अधूरा व्रत करती थी। छोटी बहन की संतानें जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त होती थीं, जबकि बड़ी बहन के सभी संतानों का जीवन लंबा और सुखद होता था।
एक दिन छोटी बहन ने अपने दुख को सुनाने और कारण जानने के लिए कई विद्वान पंडितों को बुलवाया। पंडितों ने उसे समझाया, “तुम्हारा अधूरा व्रत तुम्हारे संतानों की विधि में बाधा उत्पन्न कर रहा है। यदि तुम पूर्णिमा का व्रत सही ढंग से और पूर्ण रूप से करोगी, तो तुम्हारे बच्चे भी सुरक्षित रहेंगे।”
इसके बाद छोटी बहन ने पंडितों की सलाह को मानते हुए विधि और विधान का पालन निर्णय लिया और शरद पूर्णिमा का व्रत पूरी श्रद्धा से करने लगी। इस तरह, उसने अपने संतान के जीवन में सुख और समृद्धि का संचार किया।
कुछ समय बाद उसकी एक संतान हुई, लेकिन वह भी जल्दी समाप्त हो गई। फिर उसने लेटे हुए बच्चे को देखकर अपना ऊपरी वस्त्र पहन लिया। इसके बाद, उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और उसे वही कुर्सी प्रदान की। जब बड़ी बहन बैठी, तो उस परिधान में बच्चे से जैसे ही उसका स्पर्श हटा, लड़का जिंदा होकर रोने लगा। गुस्से में आकर बड़ी बहन बोली, “क्या तू मुझसे मिलना चाहती थी? अगर मैं यहाँ आती, तो बच्चा मर जाता।” तब छोटी बहन ने उत्तर दिया, “यह तो पहले से ही मेरा था। तेरा सौभाग्य है कि यह जीवित है। हम दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत निभाती हैं, और मैं अधूरी रहती हूँ, जिसके कारण मेरी संतानें मुरझा जाती हैं। लेकिन तुम्हारे पुण्य से यह बालक बच गया।” इसके बाद, उन्होंने पूरे नगर में यह बात फैलाने का निर्णय लिया।
शरद पूर्णिमा का महत्व
शरद पूर्णिमा से जुड़ी कई मान्यताएँ हैं। इस दिन चंद्रमा की किरणें विशेष अमृतमयी तत्वों से परिपूर्ण मानी जाती हैं, जो कई रोगों को समाप्त करने की क्षमता रखती हैं। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात को लोग अपनी छतों पर खीर रखते हैं, ताकि चंद्रमा की रोशनी उस खीर पर पड़े। इसके बाद इसे सेवन किया जाता है। कुछ स्थानों पर इसका प्रसाद सार्वजनिक रूप से भी वितरित किया जाता है।नारदपुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी पर आती हैं। वे अपने हाथों में वर और अभय के संकेत लेकर इस संसार में यह जानने का प्रयास करती हैं कि कौन जाग रहा है। इस त्योहार को कुछ राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र, में कोजागर, कोजागरी या कोजागिरी के नाम से भी जाना जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ “कौन जाग रहा है?” है। इस प्रकार, यह कोजागर व्रत देवी लक्ष्मी की आराधना का एक विशेष तरीका है। इस दिन मां लक्ष्मी सिर्फ इस धरती पर धन और समृद्धि का वरदान नहीं देतीं, बल्कि...
कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस रात जागकर मां लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उन पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है। ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, इस रात की पूजा से मनचाहे फल की प्राप्ति संभव है। यदि किसी की कुंडली में धन योग ना भी हो, तो भी मां लक्ष्मी उन्हें धन और समृद्धि अवश्य प्रदान करती हैं। इस सब से उनके जीवन में निर्धनता का अंत होता है। इसलिए, जो लोग धन की इच्छा रखते हैं, उन्हें इस रात जागकर मां लक्ष्मी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
शरद पूर्णिमा की रात में चन्द्रमा की रोशनी का लाभ एक बार फिर से उठाने का अवसर मिलेगा। इस अवसर पर स्वास्थ्य और मानसिक आकर्षण को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

